सुनो सबकी पर करो अपने मन की

 सुनो सबकी पर करो अपने मन की




आज के दौर में मुफ्त की सलाह, देने वाले, मज़ाक उड़ाने वाले , आलोचना करने वाले चारों तरफ मिल  जाएंगे । आप अपनी किसी  समस्या का, किसी मुसीबत का ,किसी बीमारी का एक बार जिक्र करके तो देखिये आपको मुफ्त की सलाह देने वाले  हजारों मिल जाएंगे । आप अपने बेटे को आईएएस, डॉक्टर  और इंजीनियर बनाना चाहते है आप परेशान है । बस जिक्र कर दी जिये , ऐसे व्यक्ति  जो कभी दसमी भी पास  नहीं कर पाए वो भी  एक हज़ार सलाह दे देंगे। आप  अपनी बीमारी का  जिक्र कर दीजिये फिर तो आप के चारो और हर व्यक्ति डॉक्टर बन जाता है और हर बीमारी का अचूक इलाज बताता है । आप असफल  हो गए तो लोग आपकी पीठ पीछे तो मज़ाक उड़एंगे पर फिर आपको आपकी असफलता के कारण बता देंगे तथा सफल कैसे हुआ जाता है सब बता देंगे । कुछ बाबा जिनके घर में खाने के लाले पड़े है वो आपको बता देगे की  क्या उपाय कर आप एक साल  में लखपति , करोड़पति बन सकते है । बातों की बात ये है की  हर हाल  में लोग तो कुछ न कुछ कहेंगे  और जो लोगो की बात  बिना सोचे समझे मान लेता हें उससे बड़ा बुद्धू कोई नहीं होता ।  परन्तु ऐसा भी नहीं होना चाहिए की  हम किसी की न सुनें और खुद की चलाते रहें । सूनना जरूरी है इसके दो फायदे होते हैं पहला कि सामने वाला समझता है की उसका अनादर नहीं हुआ और उसकी बात आपको ठीक लगी तो वह आपसे नाराज नहीं होगा और दूसरा कई बार हमें  ऐसी  बात पता चल जाती है जो हमें पहले पता नहीं थी । अत सबकी सुनो फिर सोचो फिर कुछ करो ।

कवि गिरधर ने सच ही कहा है की


बिना विचारे जो करै, सो पाछे पछिताय।

काम बिगारै आपनो, जग में होत हंसाय॥

जग में होत हंसाय, चित्त चित्त में चैन न पावै।

खान पान सन्मान, राग रंग मनहिं न भावै॥

कह 'गिरिधर कविराय, दु:ख कछु टरत न टारे।

खटकत है जिय मांहि, कियो जो बिना बिचारे॥


इस संदर्भ में  मुझे एक बहुत ही सुंदर कहानी याद आती है  ।




एक बार एक बूढ़ा और उसका बेटा गधे को साथ लेकर बाजार जा रहे थे। रास्ते में खड़े कुछ लोग हंसने लगे। एक व्यक्ति बोला ”भला इस गधे को बिना बोझ लादे ले जाने से क्या लाभ? अरे तुम दोनों में से एक इस पर बैठ क्यों नहीं जाता?“ अरे हां!“ बूढ़ा आदमी बोला ”आप ठीक कहते हैं।” 

यह कह कर बूढ़े ने अपने बेटे को गधे पर बिठा दिया और चल दिया। कुछ देर बाद जब वे एक गाँव के पास से गुजरे तो कुछ गाँव वाले उन्हें देखकर बोले ”अरे! यह देखो। यह कामचोर लड़का तो आराम से गधे पर बैठा है और बूढ़ा पिता उसके पीछे पैदल चल रहा है। 

अब बूढ़ा आदमी बेटे को गधे से उतार कर स्वयं गधे पर बैठ गया। अभी वे कुछ और आगे बढ़े थे कि एक कुएं के किनारे खड़ी कुछ स्त्रियां चिल्ला उठीं ”अरे! इस बूढ़े को तो देखो। कैसे मजे से गधे पर बैठा है और बच्चे को पैदल दौड़ा रहा है। बच्चे को भी गधे पर क्यों नहीं बिठा लेता।” 

यह सुनकर बूढ़े ने बच्चे को भी गधे पर अपने पीछे बैठा लिया और आगे बढ़ा। बूढ़े ने सोचा, “चलो अब तो कम से कम कोई नहीं टोकेगा। मगर जैसे ही वे अभी थोड़ी दूर ही आगे बढ़े रास्ते पर खड़े एक व्यक्ति ने उन्हें रोक लिया और बोला ” यह गधा आपका ही है?“ 

बूढ़ा बोला “हां, है तो मेरा ही। 

“भला कौन सोच सकता है कि इस बेचारे गधे पर आप लोग इतना बोझ लादते होंगे।” यह कहकर वह व्यक्ति हंसता हुआ आगे बढ़ गया। 

अब बूढ़ा व्यक्ति गुस्से से बड़बड़ाने लगा- ‘समझ में नहीं आता कि करूं तो क्या करूं। गधे पर बोझ नहीं लादता तो लोग घूर कर देखते हैं। यदि हम में से कोई एक गधे पर बैठ कर यात्रा करता है तो बैठने वाले को धिक्कारते हैं। अगर हम बाप-बेटे दोनों गधे पर बैठ जाते हैं तो भी लोग हमारा उपहास करते हैं। आखिरकर दोनों पिता-पुत्र गधे से उतरे और शेष मार्ग पैदल ही तय किया।


निष्कर्ष ये है कि…

लोगों का काम है कहना। वे आपको छोटी-छोटी बातों पर टोकेंगे, रोकेंगे, लेकिन करना क्या है या आप स्वयं तय करें। लोगों की बातों पर आकर कोई निर्णय न लें, नहीं तो कुछ तय नहीं कर पाएंगे।



टिप्पणियाँ

  1. बिल्कुल ठीक कहा है आपने कि ज़्यादा सलाह व्यक्ति के विवेक को नष्ट कर देती है, फिर भी यदि कोई उचित मार्गदर्शन देने वाला हो तो उस पर भरोसा करते हुए अपने विवेकानुसार काम करना ही समझदारी होती है।

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  2. बहुत बढ़िया उदाहरण द्वारा बात को रखा गया है

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