मंज़िल नहीं, सफ़र का आनंद लीजिए
मंज़िल नहीं , सफ़र का आनंद लीजिए मनुष्य स्वभाव से ही लक्ष्य-मुखी प्राणी है। वह हमेशा किसी न किसी मंज़िल की ओर बढ़ता रहता है। हमें लगता है कि जब फलाँ मंज़िल मिल जाएगी , तब जीवन में सच्चा सुख और संतोष प्राप्त होगा। परंतु अनुभव बताता है कि जीवन में कोई भी मंज़िल अंतिम नहीं होती। एक मंज़िल प्राप्त होते ही मन तुरंत अगली मंज़िल की कल्पना करने लगता है। विद्यार्थी सोचता है कि परीक्षा उत्तीर्ण होते ही जीवन सरल हो जाएगा , लेकिन परीक्षा के बाद प्रतिस्पर्धा की नई राहें सामने आ जाती हैं। नौकरी मिलते ही पदोन्नति की इच्छा जागती है , पदोन्नति मिलते ही प्रतिष्ठा और उच्च पद की आकांक्षा जन्म ले लेती है। इस प्रकार जीवन की मंज़िलें निरंतर बदलती रहती हैं। वास्तव में मंज़िल तो क्षणभंगुर होती है , वह केवल एक छोटा-सा पड़ाव है। लेकिन उस मंज़िल तक पहुँचने का मार्ग लंबा , श्रमसाध्य और अनेक चुनौतियों से भरा होता है। इसी मार्ग पर चलते हुए मनुष्य धैर्य , परिश्रम , अनुशासन और आत्मविश्वास जैसे अमूल्य गुणों को अर्जित करता है। यही अनुभव जीवन की असली पूँजी बनते हैं। भारतीय दर्शन में एक सुंदर संदेश दिया गय...