शांत समुद्रों में कुशल तैराक नहीं बनते
शांत समुद्रों में कुशल तैराक नहीं बनते
जीवन का
सबसे गहरा सत्य यह है कि मनुष्य की वास्तविक योग्यता सुख-सुविधा में नहीं, बल्कि संघर्षों की अग्नि में निखरती है। जो व्यक्ति केवल
अनुकूल परिस्थितियों में जीता है, वह सामान्य बना रहता है;
पर जो विपरीत परिस्थितियों, असफलताओं, अपमान, अभाव और बाधाओं से लड़ते हुए आगे बढ़ता है,
वही कुशल, परिपक्व और महान बनता है। इसी सत्य
को यह प्रसिद्ध उक्ति अत्यंत प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करती है— “शांत समुद्रों में कुशल तैराक नहीं बनते।”
आज अधिकांश
लोग अपने Comfort Zone (आरामदायक क्षेत्र) में रहना चाहते हैं। जहाँ न कोई जोखिम हो, न असफलता का भय, न परिश्रम की अधिक
आवश्यकता। परन्तु सत्य यह है कि सुविधा के घेरे में रहकर न तो बड़ी सफलता प्राप्त
होती है और न ही व्यक्ति कुशल बनता है। शांत जल में तैरना सीखना आसान है, परन्तु तूफ़ानी लहरों से जूझना ही वास्तविक तैराकी सिखाता है। उसी प्रकार
जीवन में भी चुनौतियों से बचकर नहीं, बल्कि उनका सामना करके
ही व्यक्तित्व का निर्माण होता है।
समुद्र जब
शांत होता है, तब कोई भी नाव चला सकता है। न लहरों का
भय, न तूफ़ान की चुनौती, न डूबने का
संकट। परंतु जब समुद्र उग्र हो, लहरें प्रचंड हों, दिशा धुँधली हो और जीवन संकट में हो—तब जो व्यक्ति
धैर्य, साहस, अनुभव और विवेक से नाव को
किनारे तक पहुँचा दे, वही सच्चा तैराक कहलाता है। जीवन भी
ऐसा ही समुद्र है। यहाँ संघर्ष ही मनुष्य को कुशल बनाता है।
सोना आग
में तपकर ही कुंदन बनता है। कच्चा लोहा भट्टी की ज्वाला सहकर ही मजबूत इस्पात बनता
है। हीरा वर्षों तक धरती के भीतर दबाव सहकर ही चमकता है। यदि अग्नि, दबाव और तपस्या न हो, तो मूल्यवान
वस्तुएँ भी साधारण रह जाती हैं। मनुष्य का व्यक्तित्व भी ऐसा ही है—कठिनाइयाँ उसे तोड़ती नहीं, बल्कि गढ़ती हैं।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—
“सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।”
अर्थात् सुख-दुःख, लाभ-हानि और जीत-हार में समभाव रखकर कर्म करते रहना ही श्रेष्ठता का मार्ग
है। जो व्यक्ति विपत्ति में धैर्य नहीं खोता, वही अंततः
विजयी होता है।
संघर्ष ही
सफलता की जननी है
महान
वैज्ञानिक थॉमस अल्वा एडिसन इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं। विद्युत बल्ब के
आविष्कार से पहले उन्होंने हजारों बार प्रयोग किए। बार-बार असफलता मिली, उपहास हुआ, लोगों ने कहा—“अब छोड़ दो।” पर उन्होंने हार नहीं मानी। उनका
प्रसिद्ध कथन है—
“मैं असफल नहीं हुआ,
मैंने केवल 10,000 ऐसे तरीके खोजे
जो काम नहीं करते।”
यदि एडिसन
पहली, दसवीं या सौवीं असफलता में रुक जाते,
तो संसार आज भी अंधकार में होता। उनकी सफलता का रहस्य प्रतिभा नहीं,
बल्कि Comfort Zone से बाहर निकलकर निरंतर
प्रयास करना था।
अब्राहम
लिंकन का जीवन भी संघर्ष का महाकाव्य है। वे अनेक बार चुनाव हारे, व्यापार में असफल हुए, व्यक्तिगत
जीवन में गहरे दुःख झेले, मानसिक तनाव से गुज़रे; परन्तु उन्होंने हार नहीं मानी। बार-बार गिरकर उठे। अंततः वही व्यक्ति
अमेरिका का राष्ट्रपति बना और इतिहास में अमर हो गया। यदि लिंकन केवल सुरक्षित और
आसान जीवन चुनते, तो वे कभी महान नेता नहीं बनते।
एक प्रेरक
कथा भी यही सिखाती है। एक बार एक व्यक्ति ने देखा कि एक तितली अपने कोष से बाहर
निकलने के लिए बहुत संघर्ष कर रही है। उसे दया आई और उसने कोष का छिद्र बड़ा कर
दिया। तितली बाहर तो आ गई, पर उसके पंख कमजोर रह गए और वह कभी उड़
नहीं सकी। क्योंकि वही संघर्ष उसके पंखों को शक्ति देने वाला था। जो कठिनाई बाधा
प्रतीत हो रही थी, वही उसकी उड़ान की तैयारी थी।
मनुष्य के
जीवन में भी यही सत्य लागू होता है। संघर्ष हटाकर सुविधा दे देना, कई बार विकास छीन लेना होता है।
विपत्ति ही
व्यक्तित्व की असली परीक्षा है
महाभारत में कहा गया है—
“विपत्तौ च धैर्यम्”
अर्थात्
विपत्ति में ही धैर्य की पहचान होती है। सुख के समय तो हर व्यक्ति प्रसन्न दिखता
है, पर संकट के समय ही मनुष्य का वास्तविक
चरित्र सामने आता है।
छत्रपति शिवाजी महाराज ने भी आराम में नहीं, संघर्षों के बीच अपना साम्राज्य स्थापित किया। सीमित
संसाधन, शक्तिशाली शत्रु, कठिन पहाड़ी
क्षेत्र—इन सबके बीच उन्होंने अपने साहस और नीति से इतिहास
रचा। यदि जीवन सरल होता, तो वे केवल एक सामान्य शासक बनकर रह
जाते।
डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम भी अत्यंत साधारण परिवार से
थे। बचपन में समाचार पत्र बाँटते थे। आर्थिक अभाव था, पर सपने बड़े थे। संघर्ष ने ही उन्हें भारत का “मिसाइल मैन” और राष्ट्रपति बनाया।
“हीरे
को परखना हो तो
अंधेरे में चमक देखो,
धूप में तो काँच के टुकड़े भी चमकते हैं।”
अतः कठिनाइयों
से घबराइए मत। Comfort Zone से बाहर निकलना ही विकास की
पहली सीढ़ी है। असफलता अंत नहीं, अभ्यास है। विपत्ति शत्रु
नहीं, शिक्षक है। संघर्ष बोझ नहीं, व्यक्तित्व
निर्माण की कार्यशाला है।
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